श्रँगोदय
श्रँगीऋषी एक परिचय -
श्रँगोदय एक सामूहिक प्रयास है श्रँगीऋषी (व्राह्मण) समाज के युवा साथियों क जिसका सिर्फ़ और सिर्फ़ उद्देश्य हे निराश व विखरी हुई समाज की युवा पीढी को एक सूत्रधारा में समाहित करना तथा शारीरिक व मानसिक रूप से एक उन्नत समाज की परिकल्पना !
श्रँगीऋषी
महाराज की कथा और
कैसे हम उनके वँसज
हुए इससे तो वैसे भी
हम सब वाफ़िक हैं
तो मैं उस पर ज्यादा
नहीं जाउँगा ! श्रँगीऋषी समाज के अतीत पर
मैं जाना चाहुँगा , अतीत मैं यह समाज कबीलों
मैं बँटा हुआ था तथा इनका
मुख्य व्यवसाय वस्तुअों क क्रय विक्रय
था ! इनका काफ़िला एक जगह से
सामान खरीदता था तथा जन्हाँ
उस सामान की माँग रहती
वन्हाँ जाकर बेचता था । इस
तरह साल के आठ महीने
यह अपना जीवन "वँजारे" की तरह विताते
थे जिसमें एक स्थान से
दूूसरे स्थान पर माल ले
जाना व उसका क्रय
विक्रय सामिल था । वँजारों
की तरह जीवन विताने के कारण आज
भी कई जगह उपजाती
में "वँजारा" लिखा होता है ।
आठ महीनें व्यापार करने के बाद जैसे ही वारिस
क मौसम शुरु होता था सारी टोलियाँ जो की विभिन्न दिशाओं मैं व्यापार करने को गई थी
एक जगह आकर मिलती थी एवँँ जो भी ४ महीनें मैं आय हुई उससे मजे से अपना जीवन यापन करती
थी । हर टोली एक विशेष कार्य मैं दक्ष होती थी और उसी दक्षता के अनुसार टोली क नाम
भी होता था जिसे हम आज "गोत्र" के रूप में जानते हैं । गोत्र के विषय में
विस्तार से अगले लेख में चर्चा की जाएगी ! चूँकी इस तरह से घूमनें पर लुटेरों व जँगली
जानवरों क डर बना रहता था इसलिए लोगों ने जगह जगह बसना शुरु कर दिआ जिन्हें हम आज के गाँव के रूप में जानते
हें ।



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