औरछा (राम राजा की नगरी)

औरछा (राम राजा की नगरी)  -
                  मधुकर शाह महाराज की रानी कुँवर गनेश,
                      अवधपुरी से औरछा लाईं अवध नरेश ॥


                  औरछा नगर को 16 वीं शताब्दी में बुँदेला राजा रुद्र प्रताप सिंह ने बसाया था , औरछा आने के लिए ट्रैन और बस दोनो आसानी से उपलब्ध हें, फ़्लाइट के लिए ग्वालियर(119 km) सबसे पास क एयरपोर्ट  हे । । ट्रैन से आने के लिए मध्य रैलवे के झाँसी जँ. पर उतरना होगा जो कि देल्ही से 6 घँटे की दूरी पर हे , देल्ही मुँबई रूट की सारी ट्रैन यहाँ रुकती हें । झाँसी से औरछा की दूरी 15 किमी होगी जिसके लिए झाँसी से बस और टेक्सी दोनो उपलब्ध हें । रुकने के लिए ओरछा में ही अच्छे होटल आसानी से मिल जाते हें । बुँदेलखँड के इतिहास में औरछा क अलग ही स्थान हे , यह नगर बुँदेला राजाओं की राजधानी हुआ करती थी । यँहा के महलों में मुगलों और राजपूतों दोनों की वास्तुकला क मिला जुला सँगम देखने को मिलता हे । यँहा पर हिंदुओं के ईष्ट श्री राम क भव्य मँदिर हे , और पूरे विश्व में यह एक मात्र ऐसा स्थान हे जँहा श्री राम की राजा के रूप में पूजा की जाती हे ।

  
  राम राजा मँदिर  -                        
          वेसे तो सारा औरछा नगर ही अपने आप में अद्भुत हे , उसके बाद भी अगर हम धार्मिक द्रष्टी से देखें तो  राम राजा मँदिर , बेतवा नदी ,लक्ष्मी नारायण मँदिर और हरदौल चौक महत्वपूर्ण हें । रामराजा मँदिर क निर्माण 1576 ई़ . में औरछा के राजा मधुकर शाह और उनकी धर्म पत्नी कुँअर गनेश ने कराया था । प्रतिवर्ष लगभग​  650,000 भारतीय व 25000 विदेशी श्रधालू दर्शन के लिए मँदिर आते हें । जैसा मैंने पहले बताया राम यहाँ राजा के रूप में पूजे जाते हें तो उसे के अनुरूप  ही रोज राजा के सम्मान में यँहा सलामी दी जाती हे और पुलिस भी मँदिर के बाहर द्वारपाल की तरह खडी होती हे ।  भगवान क प्रसाद भी यहाँ राजसी ही होता हे , और उसे राजभोग कहते हें ।  मँदिर के अँदर बीच में भगवान राम बाईं तरफ़ माता सीता और दाईं तरफ़ श्री लक्ष्मण जी हें , दरबार में दाईं तरफ़ माँ दुर्गा और थोडा नीचे हनुमान जी व जामवँत जी विराजमान हें । भगवान राम पध्माशन मुद्रा में हे और दाहिनें पैर के ऊपर से बाएँ पैर को मोडे हुए हें , खास बात यह हे की श्री राम धनुष, बाड की जगह ढाल तलवार लिए हुए हें ।

दिव्य दर्शन -          
            राजा राम यँहा पधमाशन में बिराजमान हें , और दाहिनें पैर के ऊपर से बाएँ पैर को मोडे हुए हें । हर रोज पूजा के बाद भगवान राम ले बाएँ पैर के अँगूठे में चँदन क तिलक लगाया जाता हे और ऐसी मान्यता हे कि श्री राम राजा के दरवार में जो इस बाएँ पैर के अँगुठे के दर्शन करते हें उनकी सारी मनोकामनाएँ पूरी होती हें । लेकिन दर्शन के समय यह अँगूठा दाएँ पैर से छुपा होने के कारण आसानी से नहीं दिखता हे , अगर आप श्री राम की प्रतिमा के दाहनें हाथ की और देखते हें तो यह दिखाई देता हे ।



भगवान राम क औरछा आने क कारण - 
              श्री राम के यहाँ आने और मँदिर निर्माण की बहुत ही रोचक कथा हे , ऐसा कहा जाता हे कि औरछा के  महाराज मधुकर शाह बाँके बिहारी( क्रष्ण ) के बडे भक्त थे और रानी  कुँवर गनेश राम की पूजा करती थी । एक बार राजा रानी दोनो श्री बाँके बिहारी के दर्शन के लिए मथुरा जाते हें । जब तक महाराज वहाँ पहुँचते हें , मँदिर के बँद होने क समय हो जाता हे और राजा रानी दर्शन नहीं कर पाते हें | रानी लौटने को कहती हें लेकिन राजा दर्शन किए बगैर जाना नहीं चाहते हें, अँत में वहीं पर रात्री विश्राम क निर्णय​ लिया जाता हे |
                               भोजन पश्चात बाहर से आए श्रधालू भजन कीर्तन आदि शुरु करते हें , मधुकर शाह जी भी उसमें शामिल होते हें और आनँदित होकर नाचने लगते हें , वह सभा इतनी भावपूर्ण और आनँदमयी होती हे कि स्वयँ श्री क्रष्ण उसमें प्रकट होकर नाचने लगते हें । आनँद में रात​ क पता ही नहीं चला , सुबह महाराज क लौटने क प्रोग्राम होता हे लेकिन कुँवर गनेश (रानी) अयोध्या जाने की इच्छा जताती हें | महाराज गुस्से में मना करते हें और कहते हें आप कितनी भी भक्ति कर लो आप के राम कभी प्रकट नहीं होने वाले , वेहतर होगा आप भी श्री क्रष्ण की हि उपासक हो जाओ । बहुत समझानें पर भी जब​जब रानी नहीं मानती तो महाराज एक शर्त रखते हें की ठीक ह आप जाओ लेकिन लौटकर तभी आना जब श्री राम आपके साथ आएँ |
                       यह सुनकर  रानी तुरँत तैयार हो जाती हें  और अयौध्या जाने की तैयारी में जुट जाती हें साथ ही मधुकर शाह को बिना बताए सेवकों को भगवान राम के लिए विशाल मँदिर बनाने क आदेश  भी देती हें , उस मँदिर को आज हम चतुर्भुज मँदिर के नाम स जानते हें । अयोध्या पहुँच कर रानी बिना कुछ खाए पिए कठोर​ तप शुरु करती हे , जब श्री राम के दर्शन नहीं हुए तो निराश होकर रानी ​सरयू में प्राड त्यागने  क निश्चय करती हें ,  जैसे ही रानी कूदने को तैयार होते हें कि भगवान बाल रूप में कुँवर गनेश की गोदी में आ जाते हें ।  रानी बडी प्रसन्न होती हे , भगवान भी रानी से प्रसन्न होकर वर माँगने को कहते हें , रानी तुरँत भगवान से बाल रूप में ही औरछा चलने की बात कहती हें । भगवान भी मान जाते हें लेकिन अपनी तीन शर्तें रखते हें –
1. पहली शर्त के अनुसार वह सिर्फ़ पुश्य नक्षत्र में ही चलेंगे ।
2. दूसरी शर्त की वह राजा की तरह वहाँ रहेंगे , न की भगवान के ।
3. तीसरी शर्त के अनुसार यहाँ से चलने के पश्चात एक बार जहाँ बिठा दिआ वही अन्तिम स्थान होगा, वहाँ से नहीं उठेंगे ।

                    
           रानी सारी शर्तें मान लेती हे , और रानी भगवान के बाल रूप को लेकर वहाँ से प्रस्थान करती हे । सिर्फ़ पुश्य नक्षत्र में चलने के कारण रानी को पूरे ८ महीनें लगते हें औरछा आने में , आने पर जगह - जगह रानी क भव्य स्वागत होता हे, जैसे ही रानी अपने रनिवास में पहुँचती हें तो थकी होनें के कारण बाल रूप श्री राम को एक चबूतरे पर बैठा देती हें ,और शर्त के अनुसार वही फ़िर आज क राम मँदिर बनता हे , जो कभी रानी क रनिवास हुआ करता था |


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