जराय का मठ

  जराय का मठ -

प्रवेश द्वार की पांच शाखाएं। भव्यता और आकर्षण ऐसा कि हर कोई खिंचा चला आए। पत्थरों से बने मंदिर की अद्भुत नक्काशी आप एकटक देखते रह जाएंगे। मूर्तिकला का अचंभित कर देने वाला लावण्य सोचने पर मजबूर कर देता है कि यह किन कारीगरों ने किस काल में रचा होगा। इस जगह से परिचय कराने के लिए हम आपको लिए चलते हैं जराय का मठ ।  

Sign Board on road side 

                                    झाँसी ऊरानीपुर रोड पर पूर्व मुखित जराए मठ प्रतिहार कालीन वास्तुकला के गौरवशाली अध्याय लगभग 850 से लगातार साक्षी बना रहा है ! यह मँँदिर एक ऊँची चहारदीवारी के अँदर लगभग तीन फ़ुट ऊँचे चबूतरे पर पँचरत्न शैली में निर्मित है ! मँदिर के अँदर एक गर्भग्रह ,अँतराल अर्ध टूटा द्वार आज भी स्थित है सामन्यत​: हिन्दू मँदिरों के गर्भग्रह वर्गाकार होते हैं लेकिन इसके विपरीत यँहा गर्भग्रह आयताकार आकार है जो की विष्णु जी को लेटी हुई अवस्था मैं दर्शाने के लिए बनाया जाता है मँँदिर के चौकीदार से पूछने पर हमें पता चला की मुख्य मूूर्ति के रूप में कभी इस मँदिर में माँ अम्बा देवी की मूर्ती हुआ करती थी जो की पूर्ड रखरखाव होने से आज गायब हो चुकी है । कभी इस मँदिर के शिखर में 15 मँजिलें हुआ करती थी लेकिन वक्त के साथ आज एक तिहाई शिखर नष्ट हो चुका है फ़िर भी शिखर के 5 माले आज भी देखे जा सकते हैं ! शिखर क पुननिर्माड लगभग 17 वी ईसवी में किआ गया होगा, यह वह समय था जब बुन्देला शासकों द्वारा आसपास के और भी मँदिरों की मरम्मत की जा रही थी ।

Side view of temple showing 5 stories


शक्ति उपासना का केंद्र


मँदिर में देव मूर्तियों के अंकन को प्रमुखता दिए जाने से ऐसा माना जाता है कि यह मंदिर उस समय शक्ति उपासना का केंद्र रहा होगा मठ पंचरथ शैली का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर का अलंकरण और शिल्पांकन बस देखते ही बनता है। परिसर में लगा बोर्ड जानकारी देता है कि यह मंदिर संभवत: महाभारत में वर्णित यक्षिणी जरा के नाम से बनवाया गया था।  इतिहास के जानकार बताते हैं कि औरंगजेब ने इस मंदिर की देवी मूर्तियों को खंडित कर दिया था, लेकिन वह मंदिर को पूरी तरह से तोड़ नहीं सका। मंदिर का मुआयना करने पर पाया बाहरी भाग में ऐसी कई मूर्तियां हैं, जो खजुराहो में स्थापित मंदिरों में बनी काम कला का प्रदर्शन कर रही हैं। ये छोटी-छोटी मूर्तियां पूरे मठ पर बनी हैं।

A broken statue 


मूर्तियों का अंकन

मंदिर के गेट पर अलंकरण देखते ही बनता है। छोटे से दरवाजे पर ही शानदार नक्काशी की गई है। दरवाजा पांच शाखाओं में बना हुआ है। इनमें गंधर्व शाखा, स्तम्भशाखा, देवशाखा, मिथुन शाखा और पत्रलता शाखा हैं। गेट के नीचे की ओर मकरवाहिनी गंगा व दूसरी नदी कर्मवाहिनी यमुना और नारी द्वारपालों की मूर्तियां कारीगरी का बेहतरीन नमूना हैं। विभिन्न भागों में विभक्त मंदिर में अंदर लक्ष्मी जी की प्रतिमा पूरी तरह खंडित है, जबकि बाहरी भागों में चारों ओर मूर्तियां हैं। आठ दिग्पाल इन्द्र, अग्नि, वायु, वरुण, कुबेर, ईशान, यम और नैऋति। भगवान विष्णु, शिव। रथिकाओं में गजलक्ष्मी, महेश्वरी, सरस्वती, चक्रेश्वरी, पार्वती एवं दुर्गा शस्त्रों से सुसज्जित हैं। महिषासुर मर्दिनी, चतुर्भुजी देवी, हिरण्याकश्यप, नरसिंह की मूर्तियां भी हैं।

Front view with main door 

द्वार सरदल -

 दरवाजे के ऊपर द्वार सरदल स्थित है जो की चार पँक्तियों में विभाजित है । ऊपर की पँक्ति में पाँच देवियों को न्रत्य की मुद्रा में दिखाया गया है , इनमें से एक देवी सरस्वती प्रतीत होती हैं । दूसरी पँक्ती में अष्ट द्वार पाल दर्शाए ग​ए हैं जिनका विवरण ऊपर दिआ जा चुका है । इस पँक्ती के मध्य में दो वराहोँ को एक दूसरे की और मुख किए दर्शाया गया है । इससे नीचे की पन्क्ती में ब्रह्मा विष्ह्नु महेश को दर्शाया गया है । अँत की पन्क्ती में ६ देवियाँ हैं जिनमें माँ लक्षमी व माहेस्वरी शामिल हैं ।

Lintel above the main door 


पँचरत्न शैली -    जैसा की मैंने पहले बताया है मँदिर पँचरत्न शैली में निर्मित है , जिसके अनुसार मुख्य मँदिर के चारों और चार छोटे - छोटे मँदिर और स्थित होते हैं प्रतिहार कालीन निर्मित सारे ही मँदिर इसी शैली अनुसरण करते देखे जा सकते हैं जराए मठ भी इससे अछूता नहीं है लेकिन समय के अँतराल के साथ आगे के दो   मँदिर नष्ट हो हैं मँदिर के पिछले भाग में दो छोटे मँदिर आज भी देखे जा सकते हैं जो की इसके पँचरत्नी होने सबूत बयान करते हैं  





दो साल तक की सजा

यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित और राष्ट्रीय महत्व का घोषित है। इसे क्षति पहुंचाने, आसपास निर्माण या खनन आदि करने पर दो साल तक की सजा या एक लाख रुपए या जुर्माना या दोनों सजा का प्रावधान है।

ASI board


कैसे पहुँचे -


    जराए क मठ झाँसी मऊरानीपुर राजमार्ग पर झाँसी से १९ किमी की दूरी पर स्थित है ! यदि आप झांसी से आ रहे हैं, तो यह आपके दाहिनी ओर राजमार्ग के किनारे पर होगा। झांसी निकटतम रेलवे स्टेशन है जो भारत के सभी प्रमुख शहरों से जुड़ा हुआ है। ग्वालियर यहाँ का नजदीकी एयरपोर्ट है ।

Road view of temple




जाते-जाते...

बरुआ सागर क​ नाम यहां स्थित भव्य झील से पड़ा है। यह झील उस समय की तकनीकी सूझबूझ की मिसाल है। राजा उदित सिंह द्वारा निर्मित इस शहर में और भी कई मनोहारी स्थान हैं। इतिहास के अनुसार 1744 में यहां बुंदेलों और मराठाओं के बीच युद्ध हुआ था। इस युद्ध की वजह से भी यह जगह अपने आप मैं ऐतिहासिक महत्व रखती है !
BaruaSagar fort


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