मथुरा गोवर्धन परिक्रमा
मथुरा गोवर्धन परिक्रमा
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चलो सखी वहाँ जाइए जहाँ बसत गिरिराज,
गोरख बेचत हरि
मिलें एक पँत दोउ काज ॥
बचपन से यह आरती
सुनता आ रहा हुँ और तब से ही मन में गिरिराज (गोवर्धन पर्वत) को देखने की इच्छा थी
, अब जाकर वह समय आया हे ,
गोवर्धन पर्वत मथुरा रेलवे स्टेशन से लगभग
२०-२२ किमी की दूरी पर हे , जाने के लिए
रेलवे स्टेशन से पब्लिक (25 -30 रु) और पर्शनल (२००-३०० रु) दोनों ट्राँस्पोर्ट आसानी से उपलब्ध हो जाते हें , गोवर्धन परिक्रमा का अपना अलग ही पौराडिक महत्व हे ,
कहते हें जब श्री क्रष्ण ने गोकुल वासियों को
इन्द्र के प्रकोप से बचाया , तब ग्राम वासियों
ने गिरिराज जी कि परिक्रमा की , और तब से आज तक
सारे भारत वर्ष के लोग यहाँ आते हें और इस पवित्र पर्वत की परिक्रमा करते हें | पूरी परिक्रमा 21 किमी की हे , सुविधा के लिए 9 किमी कि एक छोटी
परिक्रमा भी हे , श्रधालू अपने शारीरिक और मानसिक सामर्थ अनुसार
कोई भी एक चुन सकते हे , दोनों क अपना - अपना मह्त्व हे ।
परिक्रमा नँगे पैर चलकर य दँडवत होकर की जाती हे | पैदल चलकर आप 5-6 घँटे में परिक्रमा कर सकते हें । परिक्रमा के लिए 250 से 300 रु में रिक्से भी
उपलब्ध होते हें |
हम शुक्रवार की रात को मथुरा पहुँच गए , देल्ही से मथुरा के लिए हर 1 घँटे में ट्रेनें
हें जो 2 से 2:30 घँटे में आपको मथुरा पहुँचा देती हें | रात मथुरा के ही
किसि होटल में रुक लें तो बेहतर होगा , 1000 से 1500 में आराम से रूम उपलब्ध रहते हें , गोवर्धन में आपको धर्मशालाएँ और आश्रम मिल जाएँगे लेकिन अगर आप अच्छे होटल के आदि हें तो आपके लिए मथुरा ही
सही ओपशन होगा । खाने में सारे
उत्तर भारतीय भोजन बडे ही सस्ते दामों में दिख जाते हें , मीठे में आप मथुरा के प्रसिद्ध पेडे क लुत्फ़
उठा सकते हे ।
परिक्रमा प्रारँभ
- रात हम लोगों ने गोवर्धन के ही एक आश्रम में बिताई ताकि सुबह जल्दि से हम
परिक्रमा आरँभ कर सकें , हम लोग सुबह ६ बजे परिक्रमा आरँभ स्थान पर
पहुँच गए |
परिक्रमा के
प्रारँभ में ही गोवर्धन मँदिर हे ,
परिक्रमा प्रारँभ करने से
पहले हमने मँदिर में दर्शन किए लोग अपनी इच्छा अनुसार प्रारँभ में य परिक्रमा समाप्ति पर
इस मन्दिर में दर्शन करते हें ,
बेहतर हे आप पहले ही कर
लें ताकि परिक्रमा को पूर्ण व सकुशल
सँपन्न करने की बिनती भगवान से कर सकें ।
मँदिर में दर्शन उपराँत हम निकल पडे श्री गिरिराज
परिक्रमा पर –
पहला पडाव (राधा
कुन्ड) - पूरे परिक्रमा मार्ग में २१ देव स्थान मिलते हें ,कहते हें अगर आप ने गोवर्धन परिक्रमा कर ली तो सारे तीर्थों क पुन्य आपको
प्राप्त हो गया । परिक्रमा प्रारँभ से 4-5 किमी चलने के बाद हम राधा कुन्ड पर रुके
इसे परिक्रमा क पहला पडाव कहा जाता हे ।
इक पौराडिक कथा के अनुसार जब श्री क्रष्ण
ने अरिष्टासुर नाम के राक्षस क वध किआ जो कि एक साँड के रूप में था तो श्री क्रष्ण
को गौ हत्या क पाप लगा, और इसके प्रायसचित क उपाय विद्वानों ने सारे
तीर्थ स्थानों के जल से स्नान करने को बताया , अब हर जगह जाना क्रष्ण जी
के लिए सँभव नहीं था तो हर तीर्थ क जल लाकर इस कुँड की स्थापना की गई । इस कुँड पर
दीपदान करने से सारी मनोकामनाएँ पूरी होती हें ।
दूसरा पडाव
(पूँछरी क लौठा) –
धनि-धनि पूंछरी के लौठा। अन्न खाय न पानी पीवै
ऐसेई पड़ौ सिलौठा ।।
राधा कुन्ड में
दीपदान करने के बाद हम आगे की परिक्रमा के लिए चल दिए , रस्ते में हम लोगों ने अनेक देव आश्रम व मँदिरों के दर्शन किए जैसे
बालाराम मँदिर ,गोविंद कुँड आदि । लगभग 10 किमी (आधी परिक्रमा) करने पर हम अपने अगले पडाव पूँछरी के लौठा पर पहुँचते हें , गोवर्धन पर्वत एक मयूर के आकार में हे और यँहा पर उसका पिछला भाग पडता हे जो
कि किसि मयूर की पूँछ जेसा दिखता हे ,इसिलिए इसे पूँछरी कहा
जाता हे | पूंछरी गांव में ही परिक्रमा मार्ग पर श्रीलौठाजी का मन्दिर दर्शनीय है।
श्रीलौठाजी से सम्वन्धित एक कथा प्रचलित है कि - श्रीकृष्ण के श्रीलोठाजी नाम के एक मित्र थे , श्रीकृष्ण ने द्वारका जाते समय लौठाजी को अपने
साथ चलने का अनुरोध किया। इसपर लौठाजी बोले -हे प्रिय मित्र
! मुझे ब्रज त्यागने की कोई इच्छा नहीं हैं , और तुम्हारे
ब्रज त्यागने का भी मुझे अत्यन्त
दु:ख हैं। अत: तुम्हारे पुन: ब्रजागमन होने तक मैं अन्न-जल छोड़कर प्राणों का
त्याग यही कर दूंगा। जब तू यहाँ लौट आवेगा, तब मेरा नाम लौठा सार्थक
होगा।
श्रीकृष्ण ने
कहा- सखा ! ठीक है मैं तुम्हें वरदान देता हूँ कि बिना अन्न-जल के तुम स्वस्थ और
जीवित रहोगे। तभी से श्रीलौठाजी पूंछरी
में बिना खाये-पिये तपस्या कर रहे हैं उसे विश्वास है
कि श्रीकृष्णजी अवश्य यहाँ लौट कर आवेंगे, क्यों कि श्रीकृष्णजी
स्वयं वचन दे गये हैं। इसलिये इस स्थानपर श्रीलौठाजी का मन्दिर प्रतिष्ठित हैं। इस
मन्दिर के पास श्रीगौरगोविन्द दास बाबा का कीर्तन भवन दर्शनीय हैं। यहाँ पर अखण्ड
श्रीहरिनाम कीर्तन चलता रहता हे |
यँहा पर पूर्व
दिशा कि परिक्रमा पूरी हो जाति हे और आप पश्चिम दिशा कि और चलना शुरु करते हे ।
अँतिम पडाव (गोवर्धन मुखारबिंद) - श्री लोठा जी के दर्शन कर के हम आगे कि परिक्रमा के लिए निकलते हें , परिक्रमा मार्ग में जगह जगह आपको पानी, जलपान, खाना आदि बितरित करते कई सारे भक्तगण दिख जाएँगे ,रास्ते में हमने भी एक भँडारे में जाकर श्री गिरिराज जी क प्रसाद प्राप्त (खाना) किया , कुछ समय वँही पर विश्राम करने के बाद हम आगे चल दिए, लगभग 4-5 किमी और चलने पर हम गोवर्धन मुखारबिंद पहुँचते हें । जैतपुर गाँव में पडने के कारण कुछ लोग इसे जैतपुर मुखारबिंद भी कहते हें , इसी जगह श्री बाँके बिहारी (क्रष्ण) ने गोवर्धन को उँगली पर उठाया था । मुखारबिँद जाने के लिए मुख्य मार्ग से एक पतली गली जाती हे जिसमें दोनो तरफ़ धार्मिक सामग्री की दुकाने हें । गोवर्धन मुखारबिंद के पास कई सारे दूध और जलेबी के ठेले लगे होते हें, मुखारबिंद पर इसी क प्रसाद लगता हे ।
लगभग 3 बजे क समय हो गया था , मुखारबिंद तक हमारी लगभग 18 किमी की परिक्रमा पूरी हो जाती हे अभी 3 किमी और चलना था । हमने थोडे खरीददारी कि और आगे के लिए चल दिए । 4:30 तक हमने अपनी परिक्रमा पूरी की और श्री गिरिराज जी से हर साल बुलाने की बिनती कर के हम ट्रैन के लिए स्टेशन कि और चल दिए ।




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