महान योद्धा बार्बरीक (खाटु के श्याम जी )


                             हारे के सहारे श्री खाटु श्याम जी हमारे ।।
                                  बहुत ही कम लोगों को पता होगा महाभारत में एक ऐसा भी योद्धा था ,जो महाभारत के युध्द को सिर्फ़ 1 मिनिट में खत्म करने की शक्ति रखता था और वह थे बारबरीक । बारबरीक घटोत्कक्ष के पुत्र थे और इसी नाते भीम के पौत्र भी हुए । आज हम इन्हे खाटु के श्याम जी के नाम से जानते हें । राजस्थान में बडा ही भव्य मँदिर हे खाटुश्याम जी क जन्हा सच्चे मन से प्रार्थना करने से सारी समस्याओं क समाधान होता हे ।




बर्बरीक श्री कृष्ण सँवाद -
                                     बर्बरीक को बचपन से ही अस्त्र स्श्स्त्र और युद्ध कला से बडा प्रेम था , बचपन में ही बर्बरीक ने सारी युध्द विद्या अपनी माँ से सीख ली थी और​ उसने अपनी मां को युद्ध में कमजोर पक्ष की ओर से ही युद्ध करने का वचन भी दिया था।उसने कठोर तपस्या से भगवान शिव को प्रसन्न कर तीन अजेय बाण लिए थे। साथ ही अग्नि देव ने उसे एक दिव्य धनुष दिया था। बर्बरीक के दिव्य बाणों और कमजोर पक्ष का युद्ध में साथ देने की कसम के कारण श्रीकृष्ण नहीं चाहते थे कि वह युद्ध में भाग ले। अगर बर्बरीक युद्ध में भाग लेता तो पहले तो वह निश्चित ही अपने पिता भीम के पक्ष का साथ देता, लेकिन जब कौरवों का पक्ष कमजोर होने लगता तो वह माँ को दिए बचन के अनुसार​ उनसे जा मिलता। अपने पराक्रम से पांडवों से पक्ष को कमजोर बना देने के बाद वह फिर उनके पक्ष में आ जाता। इस तरह वह अपने अलावा हर किसी का नाश कर देता।




                   भगवान श्री कृष्ण को जब बर्बरीक की युद्ध में शामिल होने की योजना का पता चला तब वह ब्राह्मण का वेष धारण करके बर्बरीक के मार्ग में आ गये।  पहले तो श्री कृष्ण ने बर्बरीक का मजाक उड़ाया कि, वह तीन वाण से भला क्या युद्घ लड़ेगा। कृष्ण की बातों को सुनकर बर्बरीक ने कहा कि उसके पास अजेय बाण है और​ वह एक बाण से ही पूरी शत्रु सेना का अंत कर सकता है तथा सेना का अंत करने के बाद उसका बाण वापस अपने स्थान पर लौट आएगा।  बारबरीक की परीक्षा लेने हेतु श्री कृष्ण ने कहा कि हम जिस पीपल के वृक्ष के नीचे खड़े हैं अपने बाण से अगर वह​ उसके सभी पत्तों को छेद कर दो तो मैं मान जाउंगा कि तुम एक बाण से युद्घ का परिणाम बदल सकते हो। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार करके, भगवान का स्मरण किया और बाण चला दिया। पेड़ पर लगे पत्तों के अलावा नीचे गिरे पत्तों में भी छेद हो गया। इसके बाद बाण भगवान श्री कृष्ण के पैरों के चारों ओर घूमने लगा क्योंकि एक पत्ता भगवान ने अपने पैरों के नीचे दबाकर रखा था।
                                                    जब श्री कृष्ण को विश्वास हो गया तो अपनी योजना अनुसार ब्राह्मण वेषधारी श्री कृष्ण ने बर्बरीक से दान की इच्छा प्रकट की। बर्बरीक ने जब​ दान देने का वचन दिया तब श्री ने बर्बरीक से उसका सिर मांग लिया। बर्बरीक समझ गया कि ऐसा दान मांगने वाला ब्राह्मण नहीं हो सकता है। बर्बरीक ने ब्राह्मण से कहा कि आप अपना वास्तविक परिचय दीजिए। इस पर श्री कृष्ण ने उन्हें बताया कि वह कृष्ण हैं। सच जानने के बाद भी बर्बरीक ने सिर देना स्वीकार कर लिया लेकिन, एक शर्त रखी कि, वह उनके विराट रूप को देखना चाहता है तथा महाभारत युद्घ को शुरू से लेकर अंत तक देखने की इच्छा रखता है। भगवान ने बर्बरीक की इच्छा पूरी कि, सुदर्शन चक्र से बर्बरीक का सिर काटकर सिर पर अमृत का छिड़काव कर दिया और एक पहाड़ी के ऊंचे टीले पर रख दिया। यहां से बर्बरीक के सिर ने पूरा युद्घ देखा।




युद्घ समाप्त होने के बाद जब पाण्डवों में यह विवाद होने लगा कि किसका योगदान अधिक है तब श्री कृष्ण ने कहा कि इसका निर्णय बर्बरीक करेगा जिसने पूरा युद्घ देखा है। बर्बरीक ने कहा कि इस युद्घ में सबसे बड़ी भूमिका श्री कृष्ण की है। पूरे युद्घ भूमि में मैंने सुदर्शन चक्र को घूमते देखा। श्री कृष्ण ही युद्घ कर रहे थे और श्री कृष्ण ही सेना का संहार कर रहे थे।

खाटु श्याम जी मँदिर निर्माण -
               श्री कृष्ण वीर बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुये और वरदान दिया कि कलियुग में तुम श्याम​ नाम से जाने जाओगे, क्योंकि कलियुग में हारे हुये का साथ देने वाला ही श्याम नाम धारण करने में समर्थ है। उनका शीश खाटू में दफ़नाया गया। एक बार एक गाय उस स्थान पर आकर अपने स्तनों से दुग्ध की धारा स्वतः ही बहा रही थी, बाद में खुदायी के बाद वह शीश प्रगट हुआ, जिसे एक ब्राह्मण को सुपुर्द कर दिय गया। कुछ समय बाद श्री खाटु श्याम जी ने खाटू के राजा को स्वप्न दिया तथा मन्दिर निर्माण के लिये और वह शीश मन्दिर में सुशोभित करने के लिये प्रेरित किया। तदन्तर उस स्थान पर मन्दिर का निर्माण किया गया और कार्तिक माह की एकादशी को शीश मन्दिर में सुशोभित किया गया, जिसे बाबा श्याम के जन्मदिन के रूप में मनाया जाता है। मूल मंदिर 1027 ई. में रूपसिंह चौहान और उनकी पत्नी नर्मदा कंवर द्वारा बनाया गया था। मारवाड़ के शासक ठाकुर के दीवान अभय सिंह ने ठाकुर के निर्देश पर १७२० ई० में मंदिर का जीर्णोद्धार कराया | मूर्ति गर्भगृह में प्रतिष्ठापित की गई यह मूर्ति दुर्लभ पत्थर से बनी है।
                                 
                         यूं तो खाटू श्याम के दरबार में सालों भर हर रोज भीड़ होती है पर, फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष में यहां विशाल मेला भरता हैजिसमें देश-विदेश से भक्तगण पहुंचते हैं। हजारों लोग यहाँ पदयात्रा कर पहुंचते हैं,वहीं कई लोग दंडवत करते हुए खाटू नरेश के दरबार में हाजिरी देते हैं। हर एकादशी और रविवार को भी यहां भक्तों की लंबी कतारें लगी होती हैं। मंदिर के आसपास सुंदर सा बाजार है। यहां से लोग मोर पंख और राजस्थानी पगड़ियां खरीद कर ले जाते हैं। मंदिर के आसपास में रहने के लिए कई धर्मशालाएं और गेस्ट हाउस बने हुए हैं।

मन्दिर तक केसे पहुँचे -
   
                खाटु श्याम जी मँदिर राजस्थान के सीकर जिला में स्थित हे । देल्ही से यह लगभग 300 किमी और जयपुर से 80 किमी की दूरी पर हे । जयपुर से खाटू श्याम के लिए सीधी बस सेवा है। सिंधी कैंप बस स्टैंड से अमूमन हर आधे घंटे पर बसें मिलती हैं। ये बसें रींगस होते हुए खाटू श्याम तक जाती हैं। अगर आप ट्रेन से जाएं तो जयपुर से रींगस तक जा सकते हैं छोटी लाइन से। सबसे पास क रैलवे स्टेशन रींगस हे जो २० किमी  की दूरी पर हे | दिल्ली से रींगस तक के लिए सीधी रेलगिड़यां भी हैं। वहां से फिर बस लेनी पड़ेगी। मंदिर से आधे किलोमीटर पहले छोटा सा बस स्टैंड है। दिल्ली से खाटू श्याम के लिए हर महीने के पहले शनिवार को बस भी जाती है जो खाटू श्याम और सालासर बालाजी के दर्शन कराकर वापस ले आती है।


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